टहलते हुए आइए, सोचते हुए जाइए.

Friday, March 6, 2009

गुरु नानक और भोजन

एक बार गुरु नानक अपने शिष्यों के साथ कहीं जा रहे थे। एक जगह उनहोंने विश्राम लिया। वहाँ के जमींदार ने उन्हें भोजन पर आमंत्रित kiyaa। गुरु नानक जी ने विनम्रता से मना कर दिया। फ़िर एक गरीब किसान ने आ कर उनसे अपने यहाँ भोजन कराने का आग्रह किया। गुरु नानक जी तुंरत मान गए।

इधर जमींदार अपनी बात की अवहेलना से बहुत नाराज़ हुआ। उसने गुरु नानक को शिष्य समेत पकड़ आने का आदेश दिया। गुरु नानक के पहुँचने पर उसने बड़े क्रोध से उसका आतिथ्य स्वीकार न कराने का कारण पूछ। गुरु नानक ने जमींदार के यहाँ से खाना मंगवाया। फ़िर किसान के यहाँ से भी। कहते हैं की जमींदार के यहाम का खाना के कर उनहोंने निचोडा तो उसमें से खून की धारा बह निकली। अब उनहोंने किसान के यहाँ का खाना निचोडा तो उसमें से दूध की धार बह निकली। गुरु नानक ने कहा की इसीलिए मैंने तुम्हारे यहाँ का भोजन स्विक्कर नहीं किया क्योंकि इसमें ग़रीबों का खून व् हाय मिला हुआ है, जबकि इस किसान की मेहनत मजूरी की रोटी में सच्ची मेहनत और लगन बसी हुई है।

3 comments:

Mired Mirage said...

बढ़िया!
घुघूती बासूती

mehek said...

bahut sundar katha

विष्णु बैरागी said...

अनगिनत बार पढी हुई यह कहानी कितनी ही बार पढें, हर बार मनुष्‍यता, सत्विकता, शुचिता और परिश्रम के प्रति आस्‍था बढाती है।