टहलते हुए आइए, सोचते हुए जाइए.

Wednesday, March 4, 2009

गुरु नानक और उनका आशीष

एक बार गुरु नानक अपने शिष्यों के साथ कहीं जा रहे थे। रास्ते में शाम हो जाने पर उन सबने एक गाँव में वेश्राम लिया। गुरु नानक आए हैं, यह पाता चलने पर सभ्ह गांववासी भागे-भागे आए उनके स्वागत के लिएसभी ने यथा शक्ति गुरु नानक सहित सभी का यथोचित स्वागत- सत्कार किया। चलते समय गुरु नानक ने उन सबसे कहा की "तुम सभी चारों और बिखर जाओ।"
दूसरे दिन फ़िर से यात्रा शुरू हुई। शाम होने पर फ़िर से सभी ने एक दूसरे गाँव में विश्राम लिया। इस गाँव के लोग बेहद ख़राब थे। उनके स्वागत-सत्कार की बात तो दूर, किसी ने उन्हें पूछा तक नहीं। उलटा सभी ने उन्हें अपशब्द कहे। चलते समय गुरु नानक ने उन सबसे कहा की "तुम सब एक ही जगह बने रहो।"
शिष्यों को गुरु नानक की यह बात बड़ी अजीब लगी। एक शिष्य ने पूछा की जब पहले वाला गाँव इतना अच्छा था, तो आपने उन सभी को बिखर जाने को कहा, और ये लोग जो इतने ख़राब हैं, उन्हें एक ही जगह रहने को कहा।"
गुरु नानक ने उत्तर दिया- "पहले गाँव के लोग जहाँ भी जायेंगे, अपने स्वभाव से अच्छाइयां फैलायेंगे। इसलिए उनके जाने से सभी तरफ अच्छा होगा। दूसरे गाँव के लोग एक ही जगह रहेंगे तो उनकी बुराइयां भी उसी जगह तक सीमित रहेगी। इसीलिए मैंने पहले गाँव के लोगों को बिखर जाने व् दूसरे गाँव के लोगों को एक ही जगह रहने का आशीष दिया।

2 comments:

Mired Mirage said...

बहुत बढ़िया !
घुघूती बासूती

लोकेश Lokesh said...

जब मैं एक बार बेहद परेशान हो गया था तो मेरे दादा जी ने मुझे यह प्रेरणादायक किस्सा सुना कर सांत किया था।
बहुत बढ़िया।