टहलते हुए आइए, सोचते हुए जाइए.

Thursday, March 12, 2009

मदद अनमोल

पढ़ने का इच्छुक एक लड़का घर-घर जाकर सेल्समैनशिप किया करता था। एक दिन उसे बड़ी तेज भूख लगी। मगर उसके पास केवल एक अठन्नी भर थी। उसने सोचा की अगले दरवाजे पर जाकर वह कुछ खाने को मांग लेगा। ख़राब तो लगेगा, लेकिन उसके पेट में कुछ तो जायेगा।
जब उसने दूसरे द्वार की घंटी बजाई तो वह तनिक घबडा गया। एक अत्यन्त सुंदर युवती ने दरवाजा खोला। युवक उसे देख कर घबडा गया। भोजन माँगने के बदले उसके मुंह से 'एक ग्लास पानी' निकला। उसकी हालत देख कर युवती समझ गई की उसे भूख लगी है। वह उसके लिए खाने के लिए कुछ चीजें ले आई। लडके ने खा लिया। फ़िर बोला, 'इसके कितने पैसे हुए?' युवती मुस्कुरा कर बोली की इसके कुछ भी पैसे नहीं बनते हैं। उसकी माँ ने सिखाया है की किसी की सहायता कर के उससे कुछ पाने की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए।'
समय बीतता गया। वह युवती अब एक बुजुर्ग बन गई थी। एक बार वह काफी बीमार पडी। उसे अस्पताल में भारती कराया गया। काफी दिनों तक उसका इलाज चलता रहा। बुजुर्ग महिला की यह माली हालत नहीं थी की वह उस अस्पताल का इतने दिनों तक का खर्च उठा सके। वह इस चिंता में थी की वह कैसे यहाँ का सारा हिसाब-किताब चुकता कर पाएगी।
आखिअरकार उसके जाने का दिन आ ही गया। वह अस्पताल के प्रशासन विभाग में पहुँची। उसने अपनी माली हालत बयान करनी चाही ही थी की प्रशासन वालों ने कहा की 'आप जा सकती हैं। आपका बिल भरा जा चुका है।' महिला के आश्चर्य की सीमा नहीं रही। प्रशासन वालों ने उसके हाथ में एक पात्र थमा दिया। उसमें लिखा था, 'एक प्लेट नाश्ते के बदले।' नीचे किसी डाक्टर के हस्ताक्षर थे। महिला ने हैरत से देखा। प्रशासन वाले ने कहा की यह हमारे डाक्टर का पात्र है और उनहोंने सारा बिल का भुगतान यह करते हुए कर दिया था की मेरे ऊपर इनका बहुत बड़ा क़र्ज़ है। आज चुकाने का वक़्त आया है। महिला को अपना इलाज कर रहे डाक्टर याद आए और वह घटना भी, जब उसने एक लडके की मदद की थी।

2 comments:

संजय तिवारी ’संजू’ said...

बहुत सुंदर कहानी है समाज को संदेशा देती कहानी

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा प्रसंग..अच्छे कर्मों का परिणाम भी अच्छा ही होता है.