टहलते हुए आइए, सोचते हुए जाइए.

Thursday, March 19, 2009

एक बार एक छोटी सी बच्ची भीख मांग रही थी। उसके कपडे बेहद फटे-पुराने थे। उसकी आंखों में बहुत दीनता थी। आवाज़ में बेहद करुना थी। लोग-बाग़ उसकी और देखते और अवहेलना से मुंह फेर लेते।

एक लड़का भी उस दिन उस रास्ते से गुजरा। उसने भी उस बच्ची को देखा। उसने भी उसे देखा कर अपनी नज़रें घुमा लीं और अपने रास्ते चला गया।

घर पहुँचने पर उसकी माँ ने बड़े प्रेम से उसका स्वागत किया, उसे अपनी गोद में बिठाया, उसका पसीना अपने आँचल से पोछा, उसे चूमा। फ़िर उसके मुंह-हाथ धुलवाए और उसके लिए तरह-तरह की खाने-पीने की चीजें ले आई। बच्चे को अब उस बच्ची की याद हो आई। उसका मिला कुचैला चेहरा, दीं वाणी, फटे कपडे। वह कुछ भी खा-पी नहीं सका। उसे अचानक माँ का पूजा घर याद आया और याद आए भगवान। उसने भगवान से कहा की "तुमने उस बच्ची की इतनी ख़राब हालत कर के रखी है। तुम उसकी हालत ठीक कराने के लिए कुछ करते क्यों नहीं हो?"

भगवान कहते हैं की प्रकट हुए और मुस्कुराते हुए बोले, "कौन कहता है की मैं कुछ करता नहीं हूँ। देखो, मैंने तुम्हें बनाया है और तुम्हें उससे मिलवा भी दिया है।"

3 comments:

मोहिन्दर कुमार said...

दार्शनिक प्रसंग...सचमुच हम कई वस्तुयें देख कर भी अनदेखा कर देते हैं.. समझ नहीं पाते कि ईशारा क्या है... लिखती रहें

mehek said...

sahi to hai,marmik katha,sunder

अनिल कान्त : said...

अच्छा लगा पढ़कर