सामा चकेबा का खेल मिथिला में चल रहा है. यह खेल भाई के सुख व कल्याण के लिए बहनें कार्तिक सुदी 5 से खेलना आरम्भ करती हैं, जो कार्तिक पूर्णिमा तक चलता है. इसकी कथा बहुत पहले इसी ब्लॉग पर दी थी. अब कुछ गीत दे रही हूं. कोशिश रहेगी कि कुछ अधिक गीत दे सकूं.
माई गंगा रे जुमनवाँ के एहो चीकन माटी हे
माई आनी देथिन चकबा भैया गंगा पैंसी माटी हे
बनाई देथिन्ह सामा भौजी, सामा हे चकेबा हे,
माई खेले लगली खरलीच बहिनी चारू पहर राति हे
माई खेलिए खुलिए बहिनी देहले असीस हे
माई जुग जीयू लाख जीयू, सबके अइसन भाई हे।
(गंगा और यमुना नदी की मिट्टी बड़ी चिकनी होती है। चकवा भैया गंगा नदी में घुसकर वहां की चिकनी मिट्टी लेकर आएंगे। सामा भाभी उस मिट्टी से सामा-चकेबा बना देंगी। उस सामा चकेबा के साथ खरलीच बहन सारी रात खेलेगी। सारी रात खेलने के बाद खरलीच बहन आशीर्वाद देती है कि हे मेरे भैया, तुम जुग-जुग जिया, लाख-बरस जियो। मैं ईश्र्वर से प्रार्थना करूँगी कि वह सबको तुम जैसा ही भाई दे। (सामा चकेबा खेल के अवसर पर गाए जानेवाले सभी गीत पहले चकबा भैया को संबोधित करके और बाद में उसे अपने अपने भाई को संबोधित करके गाए जाते हैं।)
Tuesday, November 16, 2010
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