टहलते हुए आइए, सोचते हुए जाइए.

Tuesday, December 11, 2007

किसे खाऊँ?

एक औरत बड़ी जबरदस्त थी, जबकि उसका आदमी बड़ा ही सीधा-सदा। एक दिन वह एक बोरा धान लेकर आया और बीबी को देते हुए कहा कि इसका वह चिवडा कूटकर रखे। जाड़े की धूप में इसे गुड के साथ खाने में बड़ा अच्छा लगता है।
आदमी काम से दस दिन के लिए बाहर गया। औरत ने चिवडा कूटकर तैयार किया। मगर खुद उसकी सुगंध से इतनी मतवाली हो गई कि घूम घूम कर उसने सारा चिवडा खा लिया। मुट्ठी भर बच गया। अब वह सोच में पडी कि वह आदमी को क्या जवाब देगी?
उसने एक उपाय सोचा। चिवडे की जगह बर्तन में उसका भुस रख दिया। रात में आदमी ने आने पर चिवडे की माँग की तो वह टाल गई और कहा कि वह कल सुबह सुबह खाए. रात में आदमी के सोने पर वह एक काला कम्बल ओढ़कर उसके पास गई और नकियाई आवाज में कहने लगी- तुम्हें खाऊं कि तुम्हारी घरवाली को कि भर घर भुस भरूँ। आदमी को लगा कि सच में चुडैल आ गई है, जभी तो नकियाई आवाज़ में वह बोल रही है. सीधा साधा तो वह था ही. वह घबडा गया और कहने लगा कि वह न उसे खाए, न उसकी घरवाली को। बस, घर में भले वह भुस भर दे। जान बचेगी तो फिर से धान आ जाएगा और उसकी प्यारी सी घरवाली फिर से उसके लिए चिवडा कूट देगी।
सुबह औरत ने कहा कि वह उसके लिए चिवडा लेकर आती है। आदमी ने उसका हाथ पकड़ लिया और रात का सारा माजरा कह सुनाया। औरत ने अविश्वास का नाटक करते हुए भंडार में जाकर देखा और चिल्ला पडी कि सच में लगता है कि रात में चुडैल आई थी। आदमी को यकीन ही नहीं हुआ कि यह सब उसकी घरवाली की करामात है। औरत अपनी योजना कारगर होते देख फूली ना समाई.

1 comment:

Mired Mirage said...

अच्छी कहानी है ।
घुघूती बासूती