टहलते हुए आइए, सोचते हुए जाइए.

Monday, August 27, 2007

तिलिया और चवलिया (मिथिला की लोक कथा )

तिलिया जब सोइरी में ही थी , जब उसकी माँ चल बसी.मरद की जाट । औरत को बिसरते और दुसरा घर बसते देर लगाती है क्या.सो तिलिया के बाप ने भी दुसरी शादी कर ली।
नयी माँ को तिलिया फूटी आखों भी ना सुहाती। कई बार उसने उसे जान से मार् डालने की भी कोशिश की। पर बेटी जाट । इतनी जल्दी मरे भला ।
कुछ दिन बद उसकी नयी माँ ने भी एक बेटी को जन्म दिया। जब दोनों बेटियाँ थोड़ी बडी हुई, तब उसने अपनी बेटी को बारह साल के लिए चावल की कोठी और सौतेली बेटी को तिल की कोठारी में दाल दिया। उसका सोचना था की बारह सल् बद चावल की कोठी से उसकी बेटी चावल जेसी ही सफ़ेद और होकर निअलेगी, जबकी दुसरी तिल जायसी कली और बदसूरत ।
बारह बरस के बद उसनस पास के सभी नगरों से सुन्दर , धनी और जवान लडके बुलाए ताकी सबसे सुन्दर और धनी के साथ वह शादी कर सके । उसने पास के गाँव से एक भिखारी को भी बुलवाया, जिससे की दुसरी की शादी उसके साथ की जा सके।
अखिर इंतजार की घरी ख़त्म हुई। कोठी के दरवाजे खुले। दोनों बेटियों को देखकर वह बेहोश हो गई। तिल की कोठी से निकली बेटी तिलोत्तमा जायसी सुन्दर थी, जबकी चावल की कोठी से निकली बेटी हड्डियों का ढांचा। उसे देखकर भिखारी भी मुँह फेरकर काला गया, जबकी सबसे सुन्दर , खुबसुरत और धनी लडके ने तिलोत्तमा जायसी सुदर लडकी से शादी कर ली।

2 comments:

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari said...

लोककथायें और लोकगाथायें पीढि़यों को संस्‍कारति व शिक्षित भी करती थी.

इस लोककथा को प्रस्‍तुत करने के लिए धन्‍यवाद.

kalpana said...

wah!! aaj bhi lok-kathaon ko bacha ke rakha gaya hai...shayad ye bhi ek madhyam hai unhe bachai rakhne ka.
bahut dhanyawaad ise hamare saath batne k liye.