एक आदमी अपने गृहस्थ जीवन से बहुत तंग आ कर वैराग्य लेना चाहता था। इसके लिए वह एक साधू के पास गया। साधू ने कहा की वैराग्य जीवन बहुत मुश्किल जीवन है, तुम उसमें राम नहीं सकते। इसलिए यह विचार छोड़ दो। मगर आदमी को यह बात ग़लत लगी। उसने कहा की गृहस्थ जीवन की दसियों मुश्किलें हैं, वैराग्य में तो कुछ करना ही नहीं होता है। साधू ने कहा की ठीक है, मैं तुम्हारी परीक्षा लूंगा। अगर तुम उसमें सफल हो गए तो मैं तुम्हें वैराग्य दिलवा दूंगा।
साधू ने उसे एक महल जैसे घर में रखवा दिया। उसकी सेवा के लिए दास-दासी थे। खाने में उसे पूरी, मेवे मिष्टान्न मिलते। उसके पास सुख और आराम के सभी साधन थे, चिंता की कोई बात नहीं थी। आदमी बड़ा प्रसन्न था।
कुछ दिनों बाद साधू ने उसे एक झोपडी में रखवा दिया। वहाँ उसे रूखा-सूखा खाने को मिलता। अपने सारे काम उसे ख़ुद कराने पड़ते। झोपडी में न बत्ती थी, न पंखा। आदमी परेशान होकर साधू के पास गया और कहा की उसे बहुत तकलीफ हो रही है। वे क्यों नहीं उसे पहले वाले घर में रख देते हैं? साधू ने मुस्कुराते हुई कहा की यह तो तुम्हारी परीक्षा की दूसरी सीधी ही है। इसी में तुम दुखी होने लगे। अभी तो वैराग्य जीवन में इससे भी अधिक कष्ट उठाने पड़ेंगे। अभी तो तुम्हें अपना सारा स्वार्थ छोरकर दूसरों के सुख के लिए काम करना होगा। गिरहस्थ जीवन वैराग्य से भी मुश्किल है मगर गृहस्थ जीवन में तुम अकारण के लोभ, लालच, मद, क्रोध आदि से दूर रहकर भी वैराग्य जीवन बिता सकते हो, जबकि वैराग्य जीवन में तुम गृहस्थी के सुख नहीं भोग सकते। फ़िर गृहस्थ जीवन तुम्हारी अपनी जिम्मेदारी है और जो अपनी जिम्मेदारियों से बचने के लिए वैराग्य अपनाता है, उसे कभी भी सुख हासिल नहीं होता।
साधू की बात सुनकर आदमी की समझ में सबकुछ आया और वह साधू को प्रणाम करके अपने घर लौट गया।
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Tuesday, December 16, 2008
Saturday, June 7, 2008
नई व्याख्या- साधू व बिच्छू
आपको पाता है, एक साधू जब नदी में स्नान कर रहे थे तो एक बिच्छू को पानी में बहते देखा। स्वभाववश उनहोंने उसे हथेली में उठाकर बाहर निकालने लगे। बिच्छू ने भी अपनी आदतावश उन्हें कत खाया। दर्द से तिलमिलाकर साधू के हाथ से बिच्छू गिर गया। फ़िर तो यह कई बार चला। कई डंक के बाद आख़िर में साधू उसे बाहर निकालने में सफल हो गए।
एक व्यक्ति यह देख रहा था। उसने साधू से पूछा, "आपने यह क्यों किया?" साधू ने कहा, "अपने -अपने स्वभाव से लाचार हम दोनों ने वही किया, जो हमें करना था ।"
व्यक्ति बोला-"अब ज़माना यह नही है। सोचिये, एक खतरनाक जीव को बचाने में आपकी इतनी मेहनत गई, समय गया और उसके बाद वह और भी खतरनाक पीढियों को जन्म देगा। ऐसे ही लोग इस दुनिया के लिए खतरनाक होते हैं"
आदमी ने शोर माछ कर लोगों को इकट्ठा किया और साधू पर इल्जाम लगाया कि इसने खतरनाक किस्म के प्राणियों को बचायाहाई जिससे हम सबके जीवन को खतरा है।"
भीड़ उन्मादी होती है। भीड़ का कोई विवेक नही होता। भीड़ ने साधू को मार डाला। यह नही पूछा कि आख़िर साधू ने ग़लत किया क्या था?
एक व्यक्ति यह देख रहा था। उसने साधू से पूछा, "आपने यह क्यों किया?" साधू ने कहा, "अपने -अपने स्वभाव से लाचार हम दोनों ने वही किया, जो हमें करना था ।"
व्यक्ति बोला-"अब ज़माना यह नही है। सोचिये, एक खतरनाक जीव को बचाने में आपकी इतनी मेहनत गई, समय गया और उसके बाद वह और भी खतरनाक पीढियों को जन्म देगा। ऐसे ही लोग इस दुनिया के लिए खतरनाक होते हैं"
आदमी ने शोर माछ कर लोगों को इकट्ठा किया और साधू पर इल्जाम लगाया कि इसने खतरनाक किस्म के प्राणियों को बचायाहाई जिससे हम सबके जीवन को खतरा है।"
भीड़ उन्मादी होती है। भीड़ का कोई विवेक नही होता। भीड़ ने साधू को मार डाला। यह नही पूछा कि आख़िर साधू ने ग़लत किया क्या था?
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